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29. श्रीमद्भगवद्गीता यथारूप_प्रश्नोत्तरी श्रृंखला_7.01–7.07

Authored by Abhay Ram Das

Religious Studies

University

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29. श्रीमद्भगवद्गीता यथारूप_प्रश्नोत्तरी श्रृंखला_7.01–7.07
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5.

MULTIPLE CHOICE QUESTION

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भगवान् श्रीकृष्ण ने श्लोक संख्या 7.01 में असंशयं शब्द क्यों प्रयोग किया है ?

क्योंकि अनादिकाल से भौतिक प्रकृति के संपर्क से उत्पन्न अज्ञानता के कारण हम जीवात्माओं की प्रकृति संदेहपूर्ण हो गई है ।

क्योंकि अपूर्ण इन्द्रियों से उत्पन्न भ्रम के कारण हम जीवात्माओं की प्रकृति संदेहपूर्ण हो गई है ।

क्योंकि प्रकृति के तीनों गुणों के अधीन बद्धावस्था के कारण हम जीवात्माओं की प्रकृति संदेहपूर्ण हो गई है ।

यह सभी कथन भगवान् द्वारा असंशयं शब्द की प्रयुक्ति के महत्त्व को स्पष्ट करते हैं ।

6.

MULTIPLE CHOICE QUESTION

2 mins • 1 pt

परम सत्य को जानने की वास्तविक विधि क्या है ?

कृष्णभावना से पूरित होकर मन को योगाभ्यास द्वारा कृष्ण में आसक्त करके संशयरहित परमसत्य अर्थात भगवान् श्रीकृष्ण को जाना जा सकता है ।

शास्त्रों के अध्ययन तथा शुष्क मानसिक चिंतन द्वारा भगवान् श्रीकृष्ण को किसी भी परिस्थिति में - देश अथवा काल के प्रभाव में स्पष्टतः जाना जा सकता है ।

विद्वानों तथा आचार्यों द्वारा परस्पर शास्त्रार्थ अथवा तर्क-वितर्क के माध्यम से ही भगवान् की स्वाभाविक स्थिती को समझा जा सकता है ।

केवल ज्ञानयोग तथा ध्यानयोग/अष्टाँगयोग के योगाभ्यास द्वारा ही भगवान् की स्वाभाविक स्थिती को पूर्णतः समझा जा सकता है ।

7.

MULTIPLE CHOICE QUESTION

3 mins • 1 pt

निर्विशेष ब्रह्म तथा अन्तर्यामी परमात्मा की अनुभूति परमसत्य का पूर्ण ज्ञान नहीं है । जबकि यह दोनों अवस्थाएँ परमसत्य की पूर्ण अभिव्यक्तियाँ हैं । ऐसा क्यों ? स्पष्ट करें ।

क्योंकि निर्विशेष ब्रह्म केवल सत विग्रह की पूर्ण अभिव्यक्ति है, अन्तर्यामी परमात्मा (सत + चित) विग्रह की पूर्ण अभिव्यक्ति है जबकि परमसत्य या श्रीभगवान् सच्चिदानन्द (सत + चित + आनन्द) विग्रह की पूर्ण अभिव्यक्ति हैं ।

क्योंकि अन्तर्यामी परमात्मा केवल सत विग्रह की पूर्ण अभिव्यक्ति है, निर्विशेष ब्रह्म (सत + चित) विग्रह की पूर्ण अभिव्यक्ति है जबकि परमसत्य या श्रीभगवान् सच्चिदानन्द (सत + चित + आनन्द) विग्रह की पूर्ण अभिव्यक्ति हैं ।

क्योंकि निर्विशेष ब्रह्म तथा अन्तर्यामी परमात्मा श्रीभगवान् के अंशावतार हैं । अतः इनकी अनुभूति से परमसत्य या श्रीभगवान् को नहीं समझा जा सकता है ।

क्योंकि निर्विशेष ब्रह्म तथा अन्तर्यामी परमात्मा का श्रीभगवान् के साथ कोई सम्बन्ध नहीं है । अतः इनकी अनुभूति के माध्यम से परमसत्य या श्रीभगवान् को जानने का कोई प्रश्न ही नहीं उठता है ।

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